साहित्य

नामचीन रचनाकारों ने दी पद्मश्री

. बशीर बद्र को

*मेंहदावल/संतकबीरनगर|* यादे बशीर बद्र मुशायरे में गुरुवार शाम दुनिया भर में मशहूर शायर फैज़ खलीलाबादी ने सुख़न साथी संस्था के बैनर तले मेंहदावल नगर पंचायत हाल नई बाज़ार में पढ़े, और औरत के मुख्तलिफ किरदार पर रौशनी डाली थी।

“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए” बशीर साहब का यह शेर दुनिया के हर अदब नवाज़ को याद है, और उनकी ज़िन्दगी की शाम हुई और उनके दिवाने उन्हें ख़िराजे अकीदत (श्रधांजलि ) देने के लिए मुशायरे का आयोजन किया।

कार्यक्रम में राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपना लोहा मनवा चुके कवि- शायरों ने शिरकत की थी।

कार्यक्रम के प्रथम चरण में आयोजक व संयोजक अजीत यादव ने पद्मश्री बशीर बद्र साहब को श्रद्धांजलि दी और उर्दू शायरी में उनके योगदान व भूमिका को श्रोताओं को बताया समझाया।

अजीत यादव ने अपने वक्तव्य में कहा कि ” डा. साहब उर्दू शायरी के जदीद लहजे के जनक कहे जाते हैं, बशीर साहब मंच से सिर्फ शायरी नहीं सुनाते थे बल्कि शायरी पढ़ाते व सिखाते थे!

मिडिया से बात करते हैं संयोजक ने कहा कि बशीर साहब घर का वह बूढ़ा ज़िम्मेदार है जो अपने जीवन का अनुभव शायरी के माध्यम से दुनिया को बताया समझा है।

उदाहरण के तौर पर उन्होंने बशीर साहब के शेर पढ़े कि

” कोई हाथ भी न मिलायेगा जो गले लगोगे तपाक से

ये नये मिज़ाज का शहर है ज़रा फासले से मिला करो”

“बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फासला रखना

जहाँ दरिया समुंदर में मिला दरिया नहीं रहता ”

मुशायरे की शुरुआत पारम्परिक तरीके से सरस्वती वंदना व नाते पाक से की गई, सरस्वती वंदना पढ़ने का सौभाग्य बीएन पांडे को मिला वही नाते पाक पढ़ने की सनद ज़ीशान ज़िया को हासिल हुआ।

मुशायरे के बहरिया दौर की शुरुआत मेंहदावल के युवा शायर, पत्रकार अब्दुल करीम मेंहदावली ने की, उसके बाद ज़ीशान ज़िया माइक पर आते हैं

“मेरी गुरबत मुझे परदेस उठा लाई

मैंने सोचा था कभी गांव नहीं छोडूंगा”

यह शेर पढ़ते ही पूरे हाल में वाह वाह की सदा गूंज उठी, मुशायरे के संयोजक अजीत यादव ने पढ़ा कि-

“कल एक मस्जिद तोड़ी गई शहर में

लगा मेरा शिवाला जा रहा है”

पढ़कर कौमी एकता का संदेश दिया और नफरती सरों को ख़म कर दिया।

सिद्दार्थ नगर के कवि, शायर पंकज सिद्दार्थ ने पढ़ा कि-

“मेरी बुराई भी करते हैं पीठ पीछे खूब

जो भाई मुझको गले से लगाकर बोलते है”

यह शेर जैसे ही महफ़िल में पढ़ा गया लोग अपनी शफों से उठकर दाद देने पर मजबूर हो गये।

“हर शय पे मेरा इख़्तियार होते हुए

बिगड़ गई मेरी मिट्टी कुम्हार होते हुए ”

यह शेर रहबर मेंहदावली ने पढ़े, और सबकुछ हाथ में होते हुए भी चूक हो जाती है इस पहलू को बड़े सलीके सुनाया,

दुनिया के हर अदबी खित्ते में मेंहदावल , संत कबीर नगर का परचम लहराने वाले अंतर्राष्ट्रीय शायर फैंज़ ने पढ़ा कि-

“मैं झांक आया हूँ संसद भवन के अंदर तक

वहाँ भी बोल बचन के एलावह कुछ नहीं है ”

बहुत दाद बटोरी और जनता के प्रतिनिधियों का जनता के प्रति गैर ज़िम्मेदाराने रवैये को उजागर किया।

मेंहदावल के वरिष्ठ साहित्यकार बीएन पांडे ने बचपन अपनी माटी की ज़बान में याद करते हुए पढ़ा कि-

“बचपन वाला खेल खिलौना अमराई बगिया

छूट गईल पगडंडी बागन के खट्टी अमिया”

यह गीत दर्शकों को उनके बचपन याद दिला दिये।

हलीम मेंहदावली ने “दूर देश से आये परिंदे यह पैगाम सुनाते हैं

भारत जैसा हो अपना घर ऐसा हो तो अच्छा हो”

पढ़कर देश की खूबसूरती का बखान किया।

राष्ट्रीय शायर दीदार बस्तवी ने पढ़ा कि-

“हलाल रिज़्क की चौखट पे पलने वाले चिराग़

सियाह- शब से उजाला निकाल लेते हैं”

हकीकी खून के रिश्तों को भूलने वाले

अमीर- ए- शहर से रिश्ता निकाल लेते हैं ”

जैसे अच्छे अशआर सुना कर वर्तमान की ज़मीनी हक़ीक़त से सबको रुबरु कराया और महफ़िल को एक नये उरुज़ पर ले गये।

गोरखपुर के शायर सुम्बुल हाशमी ने –

“बनके अशफ़ाक़ कभी तो कभी बनकर के हमीद

जान दे देते हैं गद्दारी नहीं करते हैं” सुनाया और दाद हासिल की।

मेंहदावल के राष्ट्रीय शायर व सहाफी और इस कार्यक्रम के अध्यक्ष अंबर बस्तवी ने सदारती कलाम पढ़े कि

“भैरों खुद ही मड़रायेंगें

बातों में रस घोलों भाई

मौत तुम्हारी राह तके है

पाप के धब्बे धो लो भाई”

सुनाकर महफ़िल लूट ली।

कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि रमेश निषाद जी उपस्थिति ने कार्यक्रम में चार चांद लगा दिये नगर अध्यक्ष रमेश ने अपने भाषण के दौरान साहित्य और समाज के सम्बन्धों पर प्रकाश डाला और कहा “साहित्य से समृद्ध, सशक्त व आदर्श की कल्पना साकार किया जा सकता है ”

कार्यक्रम को सफल बनाने में संचालन में अथक परिश्रम का परिपूर्ण ज़िम्मा तौफीक अहमद ने बहुत खूबसूरती से की।

कार्यक्रम में मनीष कुशवाहा, प्रिंस दीपक, अतुल सिंह, शादाब कादरी, सोमनाथ सभासद, रवि शंकर सभासद, अनिल जायसवाल,अवधेश यादव, ज़ुबेर अहमद, हारुन, संतोष प्रजापति, शिवा यादव, कासिम, सुनील अग्रहरि,इलियास, मासूम, शाकिब, शोएब व अन्य नगर व नगर के समीप से सैकड़ों युवा व महनीय लोगों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को सफल बना दिया।

सुखन साथी संस्था से प्रिंस दीपक, सूरज साहनी, अंकित गुप्ता व अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे।

कार्यक्रम के अंत में आयोजक व संयोजक अजीत यादव ने आये सभी साहित्यकारों व श्रोताओं को धन्यवाद व आभार व्यक्त किया।

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