
जिन कोमल हाथों में होनी थी
‘कलम’ कंधों पर होना था स्कूल का ‘बैग’ देखो लाचारी मेरी उठा रहा ढाबों और कारखानों में परिवार का ‘बोझ’ बाल श्रम शर्मसार करे।
और वो कहते हैं मैं आजाद हूं
सच तो यह है कि कितना बेबस और लाचार हूं कहने को मैं आजाद हूं।
बर्तन घिसते-घिसते मेरे छालों में
जब जोर की पीड़ा होती सब कुछ भुला देता हूं जब याद आता है गांव में मां कितना कुछ सहती।
मेरे नसीब में जितना था उतना मैंने पाया जूठन खाने को मजबूर मैं आत्मा तो मर ही गयी थी अब सड़ रही मेरी ‘काया’ कहने को मैं आजाद हूं सच तो यह है कि कितना बेबस और लाचार हूं।
सपनों का सौदागर बेच गया मुझे ‘नर्क की मंडी ‘ में भरोसा दिया था उसने गांव में जलता रहेगा चूल्हा आग लगती रहेगी कंडी में।
टीवी में चुप-छुपके देखता हूं देश हमारा अमृत-महोत्सव मनाता अरे वो मैं ही हूं जो सड़कों पर तुम्हें ‘तिरंगा’ बेचता नजर आता कौन कहता है मैं आजाद हूं कोई मुझसे पूछे कितना बेबस और लाचार हूं।
मेरी आजादी का मतलब सिर्फ 15 अगस्त को तिरंगा लहराना नहीं है बल्कि भारत ही नहीं
दुनिया को बाल श्रम, बाल दुर्व्यापार और बाल दुराचार से मुक्त कराना है।
फिर शान से कहूंगा मैं आजाद हूं भारत का भविष्य सभ्य-समाज का ताज हूं मैं ‘बालक’ हूंबाल श्रमिकों और भारत की आवाज हूं।
संगीता वर्मा कानपुर उत्तर प्रदेश
स्वरचित एवं मौलिक रचना ✍️




