
पति-पत्नी का अटूट रिश्ता समझदारी की गाँठ है।
जितनी मज़बूत बँधी हो उतनी दूर तक जाती है।
प्रेम के अथाह सागर में हिचकोले खाती चलती है,
सारी लहरों को काट-काट कर रस्ता पार कर जाती हैं।
पतवार की मूँठ पकड़ कर नैया पार हो जाती है।
रंग-बिरंगे सपने बुनते,कभी झूठ कभी सच्चे होते,
रिश्तों के खलिहानों में अपने भी तो बच्चे होते।
संस्कारों के बागीचे में, उत्तरदायित्वों का बोध होता,
धीरे-धीरे ,चलते-चलते , अंतिम पड़ाव का छोर होता,
पति-पत्नी का अटूट रिश्ता,इस हिस्से का छोर होता।
इस अटूटता की संपुष्टता ही, जीने का बलिष्ठ संबल बनता।।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन ©®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।।




