
बढ़ता जाता ताप, धरा का उर अकुलाए।
क्रोधित होकर सूर्य, अग्नि नभ से बरसाए।।
सूख गए भू कूप, हिमालय नग्न खड़ा है।
यह विकास का मार्ग, कीमती बहुत पड़ा है।।
खग-पशु सहते पाप, भूल मानव की सारी।
पादप झुलसी छाल, चली गर्मी की आरी।।
पोखर-नदिया-ताल, रिक्त हैं निज दौलत से।
मनुज न आए बाज, खनन की पर आदत से।।
स्वरचित
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश




