
*अधूरी चिट्ठी*
अधूरी चिट्ठी के कोने पर,
कुछ शब्द ठहरे रहते हैं,
जो कह न सके थे होंठ कभी,
वे कागज़ पर बहते हैं।
स्याही में भीगी यादों का,
एक मौसम सोया रहता है,
हर अक्षर में कोई चेहरा,
चुपचाप खोया रहता है,
पहली पंक्ति में हाल लिखा,
दूसरी में कुछ अरमान लिखे,
फिर दिल की धड़कन…, लिखते-लिखते,
कितने अनकहे तूफ़ान रखे,
लेकिन अचानक से रुक गई कलम,
जैसे साँस कहीं अटक गई हो,
या कोई पुरानी पीड़ा आकर,
शब्दों की राह भटक गई हो,
अब भी उस अधूरे कागज़ में,
पूरी एक कहानी रहती है,
जो कभी लिखा ही नहीं गया,
वही कहती है सबसे ज्यादा,
शायद तुम किसी दिन पढ़ लोगे उसे,
उन रिक्त पंक्तियों की भाषा,
जहाँ प्रेम बिना शब्दों के भी,
दे जाता है अपनी परिभाषा,
उन अधूरी चिट्ठी के कोने पर ||
*शशि कांत श्रीवास्तव*




