
शून्य से जीवन शुरू होता यहाॅं है मीत।
जीवनी सौगात लेकर आ लिखें हम गीत।।
मंजिलें मिलती उन्हें जो साध चलते नीति।
लक्ष्य चाहें दूर कितना हौसले से जीत।।
पांव के छाले न गिनना बढ़ करें जा कर्म।
भव्यता शुभ कर्म से ही अब बचेगा धर्म।।
एकता हो देश में तो भू बने यह स्वर्ग
मान भी अभिमान भी है देश पर उत्सर्ग।।
वक्त के किरदार पूछें आज ढेरों प्रश्न।
धर्म के बुनियाद पर ही वे मनाते जश्न।।
क्यों सुलगता आज भारत पूछता हर बाल ।
रोजगारी जब मिले तो हों सभी खुशहाल।।
लोभ छोड़ो कुर्सियों का है यही अरदास।
भाव में सद्भावना हो तो जमे विश्वास।।
भारती के भाग्य बनकर कर्म करना नेक।
एकता हो धर्म सबका द्रोहियों को फेंक।।
सुनीता सिंह सरोवर©®




