
एक शाम अकेले बैठे थे,खुद से कह रही थी मै हां मेरे पांवों को है मुझसे शिकायते कुछ -कुछ इसलिए की मैंने खींचा इन्हे पीछे कभी समाज के भय से।
मैंने खींचा इन्हे कभी कुछ ज़िम्मेदारी को महत्व देने मैंने खींचा इन्हे कभी अपनो के लिए ये पैरो को देखकर सोच रही थी।
और हो भी क्यूं ना उनके भी है सपने कुछ उनको भी है बढ़ना आगे उन्हें नही आती समझ दुनियां उन्हें तो आते है ऊंचे कदम रखने देख कर इनकी ख्वाहिशें दिल करता है।
मेरा भी स्वार्थी होना पर जिम्मेदारियो को रख कर ध्यान में फिर सोचता है सब साथ लेकर चलना, माना ये क़दम मेरे है पांव मेरे है पर इन्हे भी पड़ता है सबका सोचना इन्हे भी शिकायत है मुझसे।
एक शाम अकेले बैठे थे तब ये सोच रही थी मेरे पैरो को भी ये गिला है मुझसे अब आगे क्या करना है ये खुद से कह रही थी…..!!
स्वरचित एवं मौलिक
संगीता वर्मा
कानपुर उत्तर प्रदेश



