
है अगर नाव तो पतवार पिता है।
लग जाये कहीं चोट तो उपचार पिता है।।
खा खा के पेट आधा जो पालता है घर-
अपनों के बीच सबका सरदार पिता है।।
सबके गुनाह ओढ़ वो झुकता है हर जगह-
रखता हिसाब सबका वो रखवार पिता है।
छाया में जिसकी रह अमीरी का बोध हो-
सन्तान की हर चाह का ऐतबार पिता है।।
करता है प्यार ऐसा कि शासन न भंग हो-
लाता है सबकी चीज भले जेब तंग हो।
मिलते हैं संस्कार सबको जिसकी डांट से-
दुनियां के अनुभवों का व्यवहार पिता है।।
लोग चल ही कहाँ पाते दुनियां की भीड़ में-
अंगुली पकड़ चलाये वो मददगार पिता है।
औलाद बनें नेक औ उससे भी तेज हों-
इतनी ही ख्वाहिशों का तलबगार पिता है।।
-डॉ.उदयराज मिश्र
9453433900




