
यदि पेड़ कभी बोल पाते, कहते सुन लो मानव रे।
छाया, फल, जीवन देते हैं, क्यों करते हो घाव घने॥
शीतल पवन बहाते प्रतिदिन, हरते मन का संताप।
फिर भी हमको काट रहे हो, कैसा यह अन्याय आप॥
पक्षी हम पर नीड़ बनाते, गाते मधुरिम गीत।
हमसे ही मुस्काता जग है, हमसे धरती प्रीत॥
वर्षा को भी पास बुलाते, हरियाली के दूत।
हम बिन सूना जग हो जाएगा, टूटेंगे सब सूत्र॥
शुद्ध वायु का दान निरंतर, करते निस्वार्थ भाव।
बदले में बस प्रेम माँगते, मत देना अब घाव॥
यदि पेड़ कभी बोल पाते, देते यही संदेश।
वृक्ष बचाओ, जीवन बचाओ, होगा सुखमय देश॥
नदियाँ, पर्वत, खेत हरे सब, हमसे पाते शान।
हम बिन सूखें सपन सुहाने, वीरान हो जहान॥
आओ मिलकर वृक्ष लगाएँ, लें मन में संकल्प।
हर आँगन हरितिम हो फिर से, यही प्रकृति का कल्प॥
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार




