साहित्य

आधार छंद- दोहे

डॉ ऋतु अग्रवाल 

पावन सावन आ गया, हर्षित सब ही भक्त।

शिव गौरी की छवि हुए, सनातनी आसक्त।।

 

विष्णु शयन को जब चले, रुके सकल ही काज।

सावन उत्तम मास में, शिव शंकर का राज।।

 

नभ से बरसी बूँद जब, मुख धरती है कांति।

सावन ने भर दी सखी, तपते हिय में शांति।।

 

हिम की गोदी छोड़कर, उतरी नद् मैदान।

राग परज के छेड़ कर, कल- कल करती गान।।

 

कजरी, ठुमरी गा रहे, लो! नभ के बहलाक।

सावन में आहत हुए, प्रेमीजन हिय चाक।।

 

मोर पपीहे टेरते, कोयल गाती गीत।

सावन ऋतु में जागती, हर उर स्नेहिल प्रीत।।

 

तरु अलकों पर डोलते, जल मोती कुछ आज।

सावन में बिजुरी करे, तड़ित तरंगित साज।।

 

पाँच पत्र ही बेल से, शिव हो गए प्रसन्न।

सावन निर्मल मास में, सब दुख हों आच्छन्न।।

 

 

 

स्वरचित ✍️

डॉ ऋतु अग्रवाल

मेरठ,उत्तर प्रदेश

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