साहित्य

गोलगप्पा

जयचन्द प्रजापति

गोलगप्पा जो खाता है,

वह बड़ा मजा पाता है।

 

मन करता है रोज खाऊं,

सारे के सारे खा जाऊं।

 

दादी का भी जी मचलता है,

खूब खाने का मन करता है।

 

पर दादी के दांत नहीं है,

इसलिए वह खाती नहीं हैं।

 

दादी को तोड़कर खिलाते हैं,

सब बच्चे खूब खिलखिलाते है।

 

गोलगप्पा गोल-गोल होता है

सब बच्चों को अच्छा लगता है।

 

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जयचन्द प्रजापति ‘जय’

प्रयागराज

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