
आज हृदय बड़ा व्यथित हैं।समझ नहीं आता कि हम संसार के सृजन के सर्वश्रेष्ठ प्राणी ‘मानव’ कहाँ जा रहे हैं।समाज कहांँ जा रहा है। चारों तरफ अराजकता, विषमता,हृदयहीनता, असंवेदनशीलता का जहर फैला हुआ दिख रहा है। लोग लालच में अँधे हो गये हैं। सभी जानते हैं कि अंतिम सत्य मृत्यु ही है। सबको मरना ही है, फिर भी धन बटोरने की लालसा मन से जा नहीं रही है।पता नहीं यह कलियुग का प्रभाव है या अन्य कुछ।आज की कई घटनाओं ने मेरे हृदय को झकझोर दिया है।ये सत्य घटनायें चाहे पेपर के न्यूज हों या सामने दिखाई देने वाली।
रात के दो बजे पड़ोस में बार -बार चिल्ला कर एक बाप का अपने परिजनों को बुलाने की आवाज़ सुन कर मेरी नींद टूट गई।
एक खाता-पीता , भरा-पूरा परिवार है। पिता ने जीवन में मेहनत करके या जिस भी तरह से अच्छी खासी सम्पत्ति बनाई है। तीन तल्ला मकान है।उनकी पत्नी अपने तीसरे बच्चे को जन्म देने के कुछ सालों बाद ही मर गयीं। उन्होंने खुद बच्चों का पालन पोषण किया । दुकान भी सम्हालते रहे।दूसरी शादी नहीं किये। बच्चों के बड़े हो जाने पर उनका शादी- विवाह कर दिये।संयोग से बड़े लड़के का बड़ा बेटा मानसिक विकलांग निकल गया।उसकी भी सेवा करते। अपने हाथ से उसे खाना खिलाते,पानी पिलाते अपने पास सुलाते।घर का छोटा-मोटा काम भी करते।बेटे के साथ दुकान पर भी जाकर बैठते।करीब छःमहीने पहले उन्हें फालिज मार दिया और वे चलने-फिरने में असमर्थ होकर बिस्तर पर पड़ गये। वही चिल्ला रहे थे।हो सकता है, उन्हें पेशाब या शौच की आवश्यकता हो।वे चिल्लाते रहे, लेकिन कोई नहीं आया। मैं सो गयी। फिर मेरी नींद लगभग चार बजे खुली तो वे चिल्ला ही रहे थे।उनके बेटे अन्दर से आये और उन्हें गाली देकर मारने लगे।कहने लगे कि इसने हमारा जीना हराम कर दिया है।सोने भी नहीं देता।चिल्लाया रहता है।वे रोने लगे। मेरा हृदय फटने लगा। मैं सोचने लगी कि क्या इसीलिए हम जीवन भर मेहनत करते हैं।कमाते हैं। घर-द्वार बनवाते हैं। सम्पत्ति इकट्ठा करते हैं,कि बुढ़ापे में अशक्त होने पर अपने प्रिय परिजनों से गालियांँ और मार खायें। हालांकि वे लोग उनका दवा-इलाज करा रहे हैं।
फिर पेपर में मैंने पढ़ा कि अपने ही बेटे ने मात्र सरकार से मुवायजा पाने के लिए चारा काटने गयी अपनी 65 वर्षीय माँ को जगह -जगह से काटकर मार डाला और प्रचारित कर दिया कि गुलदार ने माँ को मार डाला है। बाद में हत्या आशंका होने पर पुलिस के द्वारा वह पकड़ा गया ।उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया और जेल भेज दिया गया।कहीं मोबाइल के लिए बच्चे तथा धन-संपत्ति के लिए अपने ही वयस्क बच्चे अपने माँ-बाप को मार दे रहे हैं। नन्हीं -नन्हीं बच्चियों से दुष्कर्म किये जा रहे। अपने मां-बाप को, बेटे-बेटियांँ अकेले छोड़ के चले जा रहे हैं।
कहीं लड़कियांँ विवाह जैसे पवित्र बंधन को बोझ समझ रही हैं।इंटर की दोस्ती को पक्का समझ कर अपने प्रेमी के साथ भाग जा रही हैं।बाद में उनके द्वारा प्रताड़ित हो रही हैं या हत्या कर फेंकी जा रही हैं। उन्हें माता-पिता की या उनके सम्मान की तनिक भी परवाह नहीं रह रही है। मातायें भी अपने बच्चों,बेटा हो या बेटी को संस्कार न देकर, फैशन करना सिखा रही हैं,जिसकी परिणति इन घटनाओं में हो रही है। समाज में अंग प्रदर्शन की भी प्रथा बढ़ती जा रही है जिससे अपराध अधिक बढ़ रहे हैं।
फिर कहीं तो अपने ही परिजन अपने मां बाप को इतना प्रताड़ित कर रहे हैं कि वे घर छोड़कर भागने पर मजबूर हो जा रहे हैं।मेरे एक परिचित जो बुढ़ापे में एक छोटी सी गुमटी में परचूनी की दुकान चला कर अपना गुजारा करते थे और फालिज बीमारी के बाद, थोड़ा सा ठीक होकर अपनी और अपने पत्नी का खर्चा चलाते थे। एक गाय रखे थे।उसका दूध निकाल कर बेचते थे।(अपने नाती-पोतों को भी दूध देते थे ,पीने के लिए।) उससे कुछ खर्चा निकल जाता था।उनके लड़कों ने उनकी दुकान छीन ली।गाय बिकवा दिया।वे पैसे -पैसे के लिए मुहताज हो गये।तंग आकर उन्होंने घर छोड़ दिया। कोई बेटा उन्हें खोजने तक नहीं गया। बाद में उनकी पत्नी ने पता चलने पर अपना मंगलसूत्र बेचकर बेटे को पांच हजार रुपया देकर लाने के लिए भेजा तो वे उन्हें लिवा लाने के लिए गये हैं।वह भी इसलिए कि जो थोड़ा-बहुत खेत है उसका वसीयत करा लिया जाय। बाद में वह जहाँ इच्छा हो जायें,मरें या जीयें। इसी तरह मेरे गाँव एक आदमी थे।उनकी पत्नी बच्चों ने न जाने क्या कह दिया कि वे घर छोड़कर निकल गये ।बीसों साल हो गये, लेकिन वे लौटे नहीं। शराबी बेटे की प्रताड़ना से तंग आकर पानी में डूबकर अन्य तरीकों से आत्म हत्या कर रहे हैं।हमारे समाज में संवेदनायें इतनी मर गयी हैं कि पत्नियांँ ,जो अपने पति की कमाई से ऐश करती रही हैं,वे उनके बीमार पड़ने पर पूछ नहीं रही हैं।पूछना तो दूर है,एक छत के नीचे रहकर भी उनका आपस में संवाद नहीं हो रहा है।यही नहीं,अब तो पत्नियाँ अपने प्रेम की खातिर विवाहिता होकर भी अपने पति को तरह-तरह के हथकंडे अपना कर प्रेमी के साथ मिल कर मार डाल रही हैं। पहले पति व उसके परिवार द्वारा प्रताड़ना की घटनाएं सुनाई देती थीं , किन्तु आज महिलाओं द्वारा पति और उसके परिवार को प्रताड़ित किया जा रहा है।दहेज और दहेज हत्या के झूठे केसों में फँसाकर उनसे रुपया ऐंठा जा रहा है।जेल भेजा जा रहा है।पति आजिज होकर आत्म-हत्या तक कर लें रहे हैं। मैंने एक घटना और पढ़ी कि एक शिक्षिका पत्नी ने अपने पति को मारने के लिए छः: महीने से एक सांप को पाल रखा था।बाद में भेद खुलने पर पकड़ी गयी।हद है पढ़कर मेरे तो रोंगटे खड़े हो गये।
ओह!मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि आधुनिक समाज कहाँ जा रहा है,इसका कारण क्या है। महिलाओं की उच्च शिक्षा या कि अत्यधिक स्वतंत्रता या अधिक विकसित होना या स्वावलंबी होना या मन में यह भावना होना कि मैं पुरुषों से कम नहीं हूँ ? सेवा भाव, प्रेम व समर्पण तो परिवार के लिए समाप्त ही हो गये हैं, अब तो एक ही घर में रहकर लोगों की आपस में बातचीत भी बन्द होती जा रही है। इसका परिणाम चिन्ता,बीमारी, हार्ट-अटैक और आत्महत्या के रूप में आ रही है। तनाव और चिन्ता से बीपी और सूगर जैसी बिमारियांँ कम उम्र में ही हो जा रही हैं।
किसी के सुख दुख से किसी को मतलब नहीं रह गया है।ऐसी बहुत सी छोटी बड़ी घटनाएं मन को आज झकझोर दी हैं।मन आज बहुत बेचैन है।आगे बढ़ने के लिए, प्रसिद्ध होने के लिए लोग एक दूसरे को लंगड़ी लगाकर गिरा रहे हैं। तरह-तरह के प्रयोग अपना रहे हैं।हम विकासशील लो ग आज कितने,निर्मम,कितने स्वार्थी और हृदयहीन हो गये हैं।समझ में नहीं आता। आज बूढ़े निराश हैं।रोज-रोज के पेपर लीक से और सरकार की दमनकारी नीतियों से , बेरोजगारी,बेकारी महंगी होती शिक्षा से छात्र परेशान हैं।बढ़ती हुई महंगाई से तथा बढ़ती हुई भीड़ से आम जनता,समाज परेशान हैं।सोच कर ,पढ़ कर आज मन बड़ा व्यथित हैं।
इस पर हमें सोचना होगा,विचार करना होगा , क्योंकि कल क्या आज भी हम इन सभी परिस्थितियों गुजर रहे हैं और भविष्य में भी गुजरेंगे। हम सभी को बूढ़े होना है।समाज में रहना है, क्योंकि हम एक सामाजिक प्राणी हैं।
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पार्वती देवी ‘गौर’ देवरिया




