
मन का बहुत कुछ रह जाता है कहने को,
यूं ही सजा मिलती है मन को चुप रहने को।
यादें नींद उड़ा देती है।
शब्द बनकर बहते हैं आंसू बहुत कुछ कहने को।
चुप्पी पसर जाती है अंतर में,
भावों को यूं ही बहने दो।
शून्य से शुरू होता है नया सफर,
भीड़ में भी अकेला रहने दो।
मन की मन में ही छुपा कर
डरते हैं खुद से ही कुछ कहने को।
ओढ़ कर मुस्कुराहट चल पड़े हैं उत्सव में झूम के नृत्य करने को।
भीड़ में भी जब वह समझ जाते हैं मन के हर घाव हर भाव तो मन कहता है उनको सब कुछ कहने को।
मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा




