साहित्य

बलात्कारआखिर कब तक

डॉ. शिखा

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” — जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहीं देवताओं का वास होता है। लेकिन आज का कटु सत्य यह है कि जिस देश में नारी को देवी का स्वरूप माना जाता है, उसी देश में हर दिन न जाने कितनी मासूम बच्चियाँ और महिलाएँ दरिंदगी का शिकार बन रही हैं।

 

आखिर कब तक लड़कियाँ किसी की हवस का शिकार बनती रहेंगी? क्या उन्हें जीने का अधिकार नहीं है? उनकी सबसे बड़ी गलती सिर्फ इतनी है कि वे एक लड़की हैं? क्यों जब भी कोई लड़की घर से बाहर निकलती है, तो अनेक गंदी निगाहें उसका पीछा करने लगती हैं? क्यों उसकी योग्यता से अधिक उसके शरीर को देखा जाता है? क्यों उसके सपनों को उसकी मंज़िल तक पहुँचने से पहले ही कुचल दिया जाता है?

 

आज स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि दो-तीन वर्ष की मासूम बच्चियाँ भी सुरक्षित नहीं हैं। अब खतरा केवल अजनबियों से नहीं, बल्कि कई बार अपने ही रिश्तेदारों और परिचितों से भी होता है। यह सोचकर ही आत्मा काँप उठती है कि आखिर इंसान इतना निर्दयी और दरिंदा कैसे बन गया कि उसे मासूम बच्चियों में भी देवी का स्वरूप दिखाई नहीं देता?

 

सबसे दुखद बात तब होती है जब पीड़िता न्याय की उम्मीद लेकर पुलिस के पास जाती है, लेकिन कई मामलों में उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया जाता, उससे अपमानजनक प्रश्न पूछे जाते हैं या शिकायत दर्ज कराने में टालमटोल की जाती है। वहीं कई अपराधी धन, प्रभाव या शक्ति के बल पर कानून से बच निकलते हैं। यद्यपि अनेक पुलिसकर्मी ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हैं, फिर भी जहाँ लापरवाही होती है, वहाँ व्यवस्था पर लोगों का विश्वास कमजोर पड़ता है। हर पीड़िता को सम्मान, संवेदनशीलता और शीघ्र न्याय मिलना ही चाहिए।

 

आज आवश्यकता केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें कठोरता से लागू करने की भी है। अपराधियों को ऐसा दंड मिलना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति किसी बेटी की ओर बुरी नज़र डालने से पहले सौ बार सोचे।

 

साथ ही, बेटियों का सशक्त होना भी समय की माँग है। आज कई विद्यालयों में कराटे और आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जो एक सराहनीय पहल है। प्रत्येक लड़की को आत्मरक्षा के मूलभूत तरीके सीखने चाहिए ताकि आवश्यकता पड़ने पर वह अपनी सुरक्षा कर सके। इसके साथ ही मोबाइल में आपातकालीन नंबर सेव रखना, भरोसेमंद लोगों के साथ अपनी लोकेशन साझा करना, सुनसान स्थानों से बचना और सतर्क रहना भी आवश्यक है। आत्मरक्षा के लिए कानूनी और सुरक्षित साधनों का उपयोग करना चाहिए तथा किसी भी खतरे की स्थिति में तुरंत पुलिस और विश्वसनीय लोगों से संपर्क करना चाहिए।

 

लेकिन सबसे बड़ी चिंता उन छोटी बच्चियों की है, जिन्हें अभी दुनिया की बुराइयों का ज्ञान भी नहीं होता। इसलिए माता-पिता और विद्यालयों का दायित्व है कि वे बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार “गुड टच और बैड टच”, सुरक्षित व्यवहार और किसी भी अनुचित घटना की तुरंत जानकारी देने के बारे में समझाएँ। यह शिक्षा उतनी ही आवश्यक है जितनी पढ़ाई।

 

समाज की सोच बदले बिना यह समस्या समाप्त नहीं होगी। बेटियों को बंधनों में रखने के बजाय बेटों को संस्कार देना होगा। उन्हें सिखाना होगा कि हर स्त्री सम्मान की अधिकारी है, कोई वस्तु नहीं। जब तक मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक केवल कानून इस समस्या का पूर्ण समाधान नहीं कर पाएँगे।

 

आइए, हम सब मिलकर ऐसा समाज बनाएँ जहाँ हर बेटी निर्भय होकर जी सके, अपने सपनों को पूरा कर सके और उसे कभी यह न पूछना पड़े—आखिर कब तक?

 

– डॉ. शिखा गोस्वामी “निहारिका”

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