साहित्य

चित्राधारित सृजन

सुषमा श्रीवास्तव

गैजेट्स का आया ऐसा जमाना,

बिना नेटवर्क झुंझलाए घराना।

पल-पल गुज़रे जैसे पहाड़ लाँघना,

दिल और दिमाग़ को लगते हैं झटके,

नेटवर्क के दिखते ही चेहरे की रंगत बदले,

मानो मिला हो कोई खोया खजाना।

ठप हो जाते हैं सारे ऑफिशियल काम,

बड़ी-बड़ी मीटिंग्स के सारे सरंजाम।

रोज़मर्रा की व्यस्तता भी निठल्ली हो जाती,

मनोरंजन, बातचीत, मुलाकात सब फ़ीकी पड़ जाती।

इतनी लाचारी का चादर मत तानो,

कुछ हक़ीक़त में भी जीना सीखो।

परवश ही तो है, नेटवर्क का सहारा,

जीवन वही जिसने हर वक्त को सँवारा।।

 

 

सुषमा श्रीवास्त, मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।

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