
बिखरी हुई है सीने में इक दिल की क़िताब सी,
हर एक हर्फ़ में जलती है कोई ख़्वाब की आग सी।
पन्ने पलट के देखो तो ज़ख्मों के सिलसिले मिलेंगे,
सूखे हुए फू़लों में बची है उदास सी महक आज भी।
तन्हाइयों की रात ने क्या-क्या लिखा है हाशिए पर,पढ़ने की फ़ुर्सत किसे है, सबकी है अपनी प्यास।
स्याही के क़तरे-क़तरे में रूह का अक़्स झलकता है,
इस बेजुबां जिल्द तले छुपी है कोई का़यनात सी।
ऐ ‘मीर’ या ‘ग़ालिब’ कोई अब इसे मुक़म्मल क्या पढ़े,
इस दर्द की दुनिया में हर साँस है इक नई सबक सी।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




