
“बुजुर्गों की उपेक्षा नहीं, उनकी गरिमा व सम्मान हमारा संकल्प” यह कोई नारा नहीं होना चाहिए। किन्तु हम सभी को इसे वास्तव में एक प्रेरणादायक संकल्प के रूप पालन करना चाहिए। बुजुर्गों को परिवार के साथ ही साथ समाज में उचित स्थान मिले यह हम सभी का कर्तव्य होना चाहिये।
बुजुर्गों की गरिमा व सम्मान हमारा संकल्प क्यों होना चाहिए:
१.बुजुर्गों का अनुभव:
हमारे बुजुर्ग हमारे समाज के साथ ही साथ परिवार की नींव होते हैं क्योंकि उनके पास जीवन का एक विशद अनुभव होता है। जिससे नई पीढ़ी की बहुत सारी समस्याओं का आसानी से हल निकाला जा सकता है।
२.भावनात्मक समर्थन:
एक कहावत है कि घर के आगे नीम का सूखा भी पेड़ हो तो भी उसके कई फायदे हैं। जब सूखे पेड़ के लिए यह भावना रही हो तो बुजुर्ग तो जीते जागते परिवार के स्तंभ हैं। उनके रहने से परिवार को सुरक्षा व विश्वास का अहसास होता है। उनकी हर बात को सुनना चाहिए उनके पास बैठना चाहिये ताकि उन्हें एकाकीपन का कभी भी आभास न हो।
३. सम्मानपूर्ण व्यवहार:
परिवार के किसी भी निर्णय में अपने बुजुर्गों को अवश्य सम्मिलित करना चाहिये। जिससे उनकी गरिमा भी बनी रहे व उन्हें यह भी लगे कि आज भी उनका परिवार में सम्मान किया जाता है।
४.नैतिक जिम्मेदारी:
बचपन में बुजुर्ग हमारा पालन पोषण करने में कोई कमी नहीं करते। कई कई बार तो वे अपने बच्चों की आवश्यकता के लिए स्वयं अभाव में भी रह लेते हैं। तो आज जब वे कमजोर हैं तो हमें भी शारीरिक, भावनात्मक व मानसिक रूप से उनका साथ देना चाहिये तथा उन्हें ढाढस बंधाते रहना चाहिये।
५.स्वास्थ्य की देखभाल:
नियमित रूप से उनके स्वास्थ्य की देखभाल के साथ उनकी दवा आदि की समय से व्यवस्था कर देनी चाहिये।
६.बुजुर्गों के कानूनी अधिकार:
बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए बने कानूनी अधिकारों की स्वयं भी जानकारी रखनी चाहिये व उन्हें भी इनसे अवगत कराते रहना चाहिए।
राज्य सरकारों व केंद्रीय सरकार द्वारा चलाये जा रहे कल्याण कार्यक्रमों जिनमें “वृद्धावस्था पेंशन” आदि योजनाएं की जानकारी कर उनको इसका लाभ दिलाने में सहायता करनी चाहिये।
अंत में यह बात कहना अनिवार्य है कि बुजुर्ग का अर्थ केवल अपने माता-पिता दादा-दादी या नाना-नानी तक ही सीमित नहीं रखना चाहिये। अपने पास पड़ोस के किसी भी बुजुर्ग की सहायता या सेवा कर आप उनकी गरिमा व सम्मान बड़ा सकते हैं।
सुरेशचन्द्र जोशी, उत्तराखंड, पिथौरागढ़।




