
भाव मनहर भर सकूँ मैं, आज ये वरदान दो।
जादू बिखेरूँ शब्द का माँ, पास आकर ज्ञान दो।
स्वर साधना चलती रहे नित, दूर हों बाधा सभी।
अक्षर बनें सब मंत्र जैसे, माँ नई पहचान दो।।
मन की हटे सब कामनाएँ, ज्योति ये जगमग करे।
मंजिल रहे बस सामने माँ, नेक ही वह ध्यान दो।।
माला बनाकर शब्द की माँ, शीश आकर नित धरूँ।
गाती रहूँ नव गीत निशदिन, माँ मधुर लय तान दो।।
निस्वार्थ सेवा दूँ सभी को, भावना परहित रहे।
‘हिम्मत’ बढ़ाना माँ सदा ही, अब अधर मुस्कान दो।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा
कोलकाता,लाडनूँ



