
“गुरु बिना ज्ञान नहीं, ज्ञान बिना सम्मान नहींपरंतु इस संसार में यदि किसी गुरु का स्थान सबसे पहले है, तो वह है “माँ”। उसी माँ को समर्पित मेरी यह स्वरचित कविता प्रस्तुत है।
माँ – मेरी पहली गुरु
माँ जननी, मेरी पहली गुरु,
जीवन की पहली ज्योति है।
उसकी ममता की शीतल छाया,
हर पल मेरी संजीवनी होती है।
उसने मुझको बोलना सिखाया,
फिर अक्षरों का ज्ञान दिया।
उँगली पकड़कर चलना सिखाया,
जीवन का सम्मान दिया।
मीठी वाणी, मधुर व्यवहार,
संस्कारों का उपहार दिया।
मर्यादा में रहकर जीना,
हर रिश्ते का सत्कार दिया।
जब-जब माँ का स्नेहिल हाथ,
मेरे सिर पर आ जाता है।
जीवन का हर अँधियारा,
क्षण भर में मिट जाता है।
माँ ने रसोई का प्रेम सिखाया,
खीर-पूड़ी बनाना सिखाया।
परिश्रम, सेवा, त्याग और ममता,
हर रिश्ते को निभाना सिखाया।
माँ के चरणों में मेरा वंदन,
वही मेरी आराध्य है।
उससे बढ़कर गुरु नहीं कोई,
वही जीवन की साध्य है।
गणपति बप्पा ने भी जग को,
एक अनुपम संदेश दिया।
माता-पिता की परिक्रमा करके,
उन्हें प्रथम गुरु का मान दिया।
जीवन की हर राह में फिर भी,
गुरु का होना आवश्यक है।
विद्यालय हो या यह संसार,
उनका मार्गदर्शन आवश्यक है।
आओ इस गुरुपूर्णिमा पर,
सब गुरुजनों का मान करें।
माँ से लेकर जीवन-गुरु तक,
श्रद्धा से सबको प्रणाम करें।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः
गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म
तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
ज्योति बरनवाल, नवादा (बिहार)




