साहित्य

परछाइयांँ

राजीव त्रिपाठी

हमने फूलों को बिखरते देखा है

कई घरों को उजड़ते हुए देखा है!!

जिस तरह पेश आते हैं मुझसे

हमने इंसानों को बदलते देखा है!!

ज़रूरत नहीं है हमें अब लोगों की

राह में तनहा गुजरते देखा है!!

जानता हूंँ एक दिन दिल टूटेगा

फिर भी मोहब्बत करके देखा है!!

ज़िन्दगी मैं परेशानियांँ है बहुत

आंँखों को लोगों नम होते देखा है!!

किसी काम की नहीं दुनिया

सिर्फ़ मतलब के लिए देखा है!!

कितने चेहरे बे-नक़ाब होंगे

लोगों को आईना बदलते देखा है!!

लंबी उम्र गुज़ारने से क्या होगा

नफ़ा-नुक़सान ज़िन्दगी होते देखा है!!

कोई हम-सफ़र भी है या यूंँ ही

हमने परछाइयो को देखा है!!

बिखरते जा रहे हैं यूंँ ही रिश्ते

बहुत कम को संभलते देखा है..!!

 

स्वरचित- राजीव त्रिपाठी

उदयपुर राजस्थान

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