
मधुर गान करने लगे,पुष्प खिले उद्यान।
ऋतु वसंत की आ गई, लिए प्रेम अनुदान।।
हरी-भरी धरती हुई, धानी चुनरी भाल।
धूप बदन से खींचती, पीत वर्ण का शाल।।
गुंजन करते हैं भ्रमर, खिले डाल पर फूल।
अमराई में चाँदनी, गई चंद्र कर झूल।।
कामदेव के बाण से, आहत सब संसार।
तीन लोक में प्रेम का, हुआ आज संचार।।
कल-कल नदिया बह चली, पिया उदधि की ओर।
प्रेम वेग से झूमतीं, लहरें करती शोर।।
स्वरचित
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ उत्तर प्रदेश




