साहित्य

आरवि की मासूमियत

सपना कुमारी

आरवि अपने पापा के साथ गाँव से दूर एक हरे-भरे खेत और खलिहान में गई थी। चारों ओर हरियाली फैली हुई थी। तभी उसकी नज़र एक छोटे से बकरी के बच्चे पर पड़ी। वह खुशी से उसके पास दौड़ गई। उसने खेत से कुछ हरी-हरी घास तोड़ी और उसे खिलाने लगी। बकरी का बच्चा भी मासूमियत से उसकी हथेली से घास खाने लगा। यह देखकर आरवि खिलखिलाकर हँस पड़ी।

उसके पापा पास ही एक आदमी से बात कर रहे थे। आरवि तो पूरी तरह उस छोटे से मेमने के साथ खेलने में खो गई थी। उसे कोने में एक छोटी बाल्टी दिखाई दी। वह उसमें पानी भरकर लाई और प्यार से बकरी के बच्चे को पिलाया। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसे एक नया दोस्त मिल गया हो।

कुछ ही मिनट बाद एक आदमी हाथ में तेज धार वाली गड़ासी लेकर वहाँ आया। उसने बकरी के बच्चे को खूँटे से बाँध दिया। आरवि कुछ समझ पाती, उससे पहले ही उस आदमी ने बकरी के बच्चे की बलि दे दी।

बकरी की दर्द भरी “में… में…” की आवाज़ सुनकर आरवि का दिल काँप उठा। उसकी आँखों के सामने उसका नया दोस्त हमेशा के लिए शांत हो गया। वह घबराकर अपने पापा से लिपट गई और फूट-फूटकर रोने लगी।

“पापा, आप गंदे हो… अंकल, आप भी गंदे हो… मैं इसे घर ले जाकर खेलती। आपने इसे क्यों मार दिया?”

उसकी बातें सुनकर वहाँ मौजूद लोग कुछ पल के लिए चुप हो गए, लेकिन किसी के पास उसकी मासूमियत का जवाब नहीं था।

थोड़ी देर बाद उस बकरी के बच्चे का मांस तैयार कर दिया गया। उसी दिन आरवि के घर में पार्टी थी। रात को मेहमान आए और सभी ने उसी का बना हुआ खाना बड़े स्वाद से खाया।

लेकिन आरवि के लिए वह खाना सिर्फ खाना नहीं था। उसकी आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य घूम रहा था—हरा-भरा मैदान, उसकी हथेली से घास खाता वह नन्हा बकरी का बच्चा, और फिर उसकी आखिरी पुकार।

वह अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर मुँह छिपाकर रोती रही। उसकी मासूम कल्पना में जैसे वह बकरी का बच्चा उससे कह रहा था—

“आरवि… मुझे भी इस दुनिया को देखना था। मेरी माँ मेरा इंतज़ार कर रही होगी। मैंने किसी का क्या बिगाड़ा था? मुझे जीने का मौका क्यों नहीं मिला?”

आरवि ने अपने आँसू पोंछे, लेकिन उस दिन के बाद उसने जानवरों को पहले से भी ज़्यादा प्यार करना शुरू कर दिया। उस छोटी-सी बच्ची के मन में यह सवाल हमेशा के लिए रह गया कि किसी की ज़िंदगी इतनी आसानी से क्यों छीन ली जाती है।

नाम सपना कुमारी कोल्हापुर

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