साहित्य

रिश्ते निभाओ, दरारें मिटाओ*

नरसिंगाराम

बदल रहे हैं रिश्ते आज, बहुत आया बदलाव ।

भूले कर्तव्य छोड़ स्नेह, भूले संस्कृति और लगाव।।

बदल गये खून के रिश्ते, परिवार की बदली परिभाषा ।

कौन सच्चा रिश्तेदार अपना, करें किससे मदद की आशा ।।

 

घट गये रिश्तों के कद, घटा रिश्तों का ठहराव ।

आज प्रेमी वही कल शत्रु, पड़ी दरारें बढ़ा अलगाव ।।

 

बदलते रिश्तों ने बढ़ाई, सत्य समाज में परेशानी ।

कौन दादा-दादी, भुआ, नहीं कोई नाना-नानी ।।

 

किसी का किसी से नाता, नहीं रहा अब नाता-रिश्ता ।

रिश्तेदार है धन-दौलत, होता वही सगा फरिश्ता ।।

 

ये अनाथालय वृद्धाश्रम ये, बदलते रिश्तों का परिणाम ।

महिला पुनर्वास निकेतन, हम भुगत रहे हैं ऐसे अंजाम ।।

 

रिश्तों को निजरूप निभाओ, समझकर अपना दायित्व ।

रिश्तों की दरारें मिट जाए, हम लिखें ऐसा साहित्य ।।

 

नरसिंगाराम जीनगर निजरूप

बाड़मेर, राजस्थान

©️®️

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