
भागमभाग की इस दुनिया में, नेतृत्व नहीं जुड़ाव रखना,
जब बिखरने लगें जज्बात मेरे, तुम रिश्तों में ठहराव रखना।
मैं खोलूँ कभी जो दिल अपना, तुम व्यग्र न होना, मौन रहना,
अगर कुछ कहूँ तड़प कर मैं, तो धैर्यवान बन सुन लेना।
आँगन की भोली तरुणाई से, अभिव्यक्ति के जो फूल खिले,
उन कोमल पौधों के गमलों में, शब्दों के अनगिनत बीज मिले।
पर पीड़ा की तीखी आभा से, जब उभरे शब्दों के गुच्छे,
तब समझ सकी मैं दुनिया में, बस दर्द के रिश्ते हैं सच्चे।
हे प्रिय! मन की इस शूलधरां पर,
तुम नमी की मिट्टी रख देना।
जो हक केवल मेरा ही था,
वह अनगिनत अधिकार रख देना।
इस अनिश्चितता के लंबे सफर पर,
तुम आकर आज विराम दे देना।
अनसुलझे शब्दों के कोमल गमले को,
निश्चितता का सुंदर श्रृंगार दे देना।
जब मौन टूटे इन होठों का, और दर्द बहे, तो चुन लेना,
अगर कुछ कहूँ इस जीवन में, तो धैर्यवान बन सुन लेना…
तुम धैर्यवान बन सुन लेना।
अभिलाषा श्रीवास्तव गोरखपुर



