
कपाली आदि ओजस्वी ,तुम्हीं हो प्रभु महादानी।
उमापति इंदुभृत करणम्,तुम्हीं हो हरि महाज्ञानी।।
असंख्येयोप्रमेयात्मा ,तुम्हीं हो इष्ट वरदानी।
अनुत्तर अव्ययात्मा ऋषि, तुम्हीं हो आत्मभू ध्यानी।।
असमलोचन अपानिधि हे, जपूँ माला तुम्हारी प्रभु।
कृतागम कत्तिवासा हे, लगे छवि लिंग प्यारी प्रभु ।।
सदा शिव तुम दिगंबर हो, दिशा का चीर धारे हो।
गले में नाग की माला, जटा में गंग डाले हो।।
डॉमंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई।




