साहित्य

जंतर-मंतर

*दया भट्ट

नारी! अपनी गरिमा पहचान

नारी! अपनी गरिमा पहचान,

तू ही संस्कृति, तू सम्मान।

 

तेरे आँचल की छाया में,

पलता भारत का अभिमान।

तेरे कारण जग में जीवित

प्रेम, दया, करुणा के गान।

 

नारी! अपनी गरिमा पहचान,

तू ही संस्कृति, तू सम्मान।

 

अधिकारों की बात उचित है,

अन्यायों का हो प्रतिकार।

किन्तु वाणी की मर्यादा का

मत होने दे तू संहार।

 

क्रोध जला दे बुद्धि-विवेक,

शब्द करें जब विष का पान,

तब संघर्षों की पावनता

हो जाती है लहूलुहान।

 

नारी! अपनी गरिमा पहचान,

तू ही संस्कृति, तू सम्मान।

 

जंतर-मंतर की राहों पर

जब स्वर ने सीमा लाँघी थी,

अपशब्दों की आँधी में

संयम की लौ काँपी थी।

 

माँगों से अधिक चर्चा में

आचरण और व्यवहार रहा,

नारी के गौरव से बढ़कर

कटु भाषा का प्रचार रहा।

 

यह कैसा नवयुग आया है?

कैसा यह अभियान हुआ?

स्वर तो ऊँचा हो पाया पर

चरित्र स्वयं हलकान हुआ।

 

नारी! अपनी गरिमा पहचान,

तू ही संस्कृति, तू सम्मान।

 

आधुनिकता का अर्थ नहीं

संस्कारों का तिरस्कार।

स्वतंत्रता का अर्थ नहीं

मर्यादा का हो संहार।

 

शिक्षा केवल वह नहीं है

जो दे ऊँची-ऊँची डिग्री,

शिक्षा वह जो क्रोध क्षणों में

रखे वाणी की भी निगरी।

 

शक्ति वही जो शिष्ट रहे,

तेज वही जो शालीन।

विजय वही जो सत्य-संग हो,

वाणी हो मधुर, प्रवीण।

 

नारी! अपनी गरिमा पहचान,

तू ही संस्कृति, तू सम्मान।

 

तू दुर्गा है, तू लक्ष्मी है,

तू ही जीवन का आधार।

तेरे कारण जग में अब तक

जीवित हैं सद्भाव-विचार।

 

तेरे मुख से जब अपशब्दों की

धारा बहने लगती है,

तब अपनी ही कीर्ति स्वयं

आँसू बन ढहने लगती है।

 

उठ, फिर अपने स्वर को दे तू

संयम का मधुर विधान।

तेरे शब्दों से ही ऊँचा हो

भारत का स्वाभिमान।

 

नारी! अपनी गरिमा पहचान,

तू ही संस्कृति, तू सम्मान।

 

तू अधिकारों की ध्वजवाहक,

तू मर्यादा की संतान।

तेरे हाथों ही सुरक्षित रहे

सभ्यता का वरदान।

 

*दया भट्ट दया*

*खटीमा (उधम सिंह नगर )*

*उत्तराखंड*

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