साहित्य

बाघ बचाओ, प्रकृति बचाओ, भविष्य बचाओ”

दिनेश पाल सिंह

वन की हरित शिराओं में ही, जीवन का संचार है,

बाघ नहीं तो समझो सूना, धरती का श्रृंगार है।

 

जिस वन में निर्भय बाघ दहाड़े, वह वन जीवित रहता है,

उसकी गोदी में हर मौसम, नवजीवन लिखता रहता है।

 

मत काटो ये वृक्ष, इन्हीं से बादल घर तक आते हैं,

सूखी धरती के अधरों पर, सावन-गीत सुनाते हैं।

 

बाघ बचेंगे तभी बचेगी, नदियों की निर्मल धारा,

वन ही मानव का वर्तमान, वन ही आने वाला कल सारा।

 

लोभ अगर जंगल निगलेगा, कौन श्वास फिर देगा हमें?

कौन धरा की गोद सजाकर, जीवनदान करेगा हमें?

 

उठो युवा! अब समय नहीं है केवल भाषण देने का,

धरती माँ के हर घावों पर हरियाली फिर से बोने का।

 

हर पौधा संकल्प हमारा, हर जंगल अभिमान बने,

बाघ सुरक्षित हों भारत में, विश्वगुरु पहचान बने।

 

आओ मिलकर प्रण यह लें—न होगा वन का अपमान,

प्रकृति-पूजन ही मानवता, यही सच्चा है धर्म महान।

 

बाघ बचाओ, प्रकृति बचाओ

यही भविष्य की ललकार,

धरती माँ की रक्षा करके, लिख दो अपना स्वर्णिम संसार।।

 

दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

जनपद संभल उत्तर प्रदेश

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