साहित्य

झूठ आज सिरमौर बना है

डॉ० शिवकुमार सिंह

झूठ आज सिरमौर बना है, सच्चे का मुँह काला है।

मानवता का दिवाला निकला, स्वार्थ सभी ने पाला है।।

 

सत्य सिसकता चौपालों में, झूठ सजाए मेला अब।

नीति-धर्म की सूनी राहें, पाप बढ़ा अलबेला अब।।

दौलत के दरबारों में अब, बिकता रोज़ उजाला है।

मानवता का दिवाला निकला, स्वार्थ सभी ने पाला है।।

 

खुशबू रिश्तों की बिखर गई, मन में उठती दूरी है।

अपनेपन के मधुर बोल पर, स्वार्थों की मजबूरी है।।

प्रेम-पुष्प मुरझाए सारे, नफ़रत ही रखवाला है।

मानवता का दिवाला निकला, स्वार्थ सभी ने पाला है।।

 

दया, धर्म, विश्वास, सभी को, देखो तो वनवास मिला।

छल-कपट के दाँव-पेंच से, कब सच्चा विश्वास मिला।।

है सत्य अकेला ठोकर खाता, कैसा समय निराला है।

मानवता का दिवाला निकला, स्वार्थ सभी ने पाला है।।

 

आओ मिलकर दीप जलाएँ, फिर मानवता जागेगी।

सत्य, प्रेम और त्याग तपस्या, मन से कटुता भागेगी।।

अँधियारा शिव हाँफ रहा है, सत्य हुआ मतवाला है।

झूठ आज सिरमौर बना है, सच्चे का मुँह काला है।।

कविराज डॉ० शिवकुमार सिंह ‘शिव’

दुसौंती रायबरेली-२२९३०६

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