साहित्य

कारगिल की चोटी आज भी बोलती है

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

नभ ने देखा रक्त से, लिखता भारत मान,

पत्थर-पत्थर गा उठा, वीरों का गुणगान।

 

बर्फ़ नहीं थी मात्र वह, तपता था विश्वास,

हर हिमशिखर ने ओढ़ ली, सैनिक की साँस।

 

गूँजी जब रण की धरा, काँपा हर तूफ़ान,

तिरंगे ने चूम लिया, विजय का आसमान।

 

गोली से भी तेज़ थे, उनके दृढ़ संकल्प,

माँ के आँचल से मिला, साहस का ही कल्प।

 

सीने पर हिमपात था, आँखों में उजियाल,

भारत माँ के लाल थे, अडिग रहे हर हाल।

 

कारगिल की हर शिला, अब भी देती गान,

“देश प्रथम” का मंत्र ही, वीरों की पहचान।

 

जिनके चरणों की धूल, बन गई इतिहास,

उनके कारण आज भी, सुरक्षित हर श्वास।

 

दीप जले जब देश में, उनका हो सम्मान,

बलिदानों से ही सजा, भारत का अभिमान।

 

नमन उन अमर वीरों को, जिनसे जग उजियार,

जब तक गंगा बहती रहे, अमर रहे कारगिल का प्यार।

 

 

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव जगदलपुर राजिम

छत्तीसगढ़

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