
खिलता हुआ कोई कमल हो,
क्या कहूं,,, तुम मेरी ग़ज़ल हो।
आफताब सा चमकता चेहरा तुम्हारा,
बेकरार सा हो गया है दिल हमारा।
यह हिरनी जैसी चाल तुम्हारी,
बातें लगती है दिल को प्यारी।
जब जब भी तुम मुस्कुराती हो,
जैसे दिल पर कहर ढाती हो।
आंखों का काजल जैसे बादल,
मुस्कान तुम्हारी फूलों सी निर्मल।
बातें जैसे ठंडी हवाओं का स्पर्श,
तुम्हें देख दिल में होता है हर्ष।
जुल्फें जैसे छायी काली घटाएं,
तुम्हारी हर अदा मेरे मन को भाए।
सादगी पर मन खुशी से खिल जाता है,
तुम मेरी ग़ज़ल हो दिल कह जाता है।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।



