साहित्य

कभी विरोध जरूरी

डॉमंजु गुप्ता

जुल्म बने है मौन जब , बोल उठो नर आज।

सच के खातिर उठ खड़ो, यही धर्म का साज।।

 

_2._

झूठ सच बनने लगे, बढ़ अधर्म है पास।

कलम उठाओ हाथ में, कर विरोध तत्काल।।

 

_3._

सहते-सहते घुट गए, मौन नहीं अब काम।

डरकर जीना मौत है, सच का लो तुम नाम।।

 

_4._

दीवारें गिरतीं जहाँ, दबती सच आवाज।

जनता मिलकर बोल दे, उस विरोध का राज।।

 

_5._

नारी पर हो वार तो, कर विरोध तत्काल।

चुप्पी तोड़ी जाय तब , यही वक्त की चाल।।

 

_6._

सिंहासन डोले तभी, जन बोले सच बोल।

बन विरोध ज्वाला तभी, अंधकार हो गोल।।

 

_7._

कायरता कह चुप रहो, मत डर नर तू आज।

गलत काम जो सामने,कर विरोध आगाज।।

 

_8._

शोषण सर पर चढ़ गया, बिक विधान बाजार।

सड़क उतर धरना करो , मांगो तुमअधिकार।।

 

_9._

मीठी बातों में फ़ँसो, मत देना अब साथ।

गलत देख कर रोक दो, पकड़ो जालिम हाथ।

 

_10._

है विरोध दर्पण तरह , दिखलाए सच साफ।

करे गलत शोषण जभी , मत कर उसको माफ।।

डॉमंजु गुप्ता।

वाशी, नवी मुंबई

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