साहित्य

जल

डॉ गीता पांडेय

अपरिहार्य है जल जीवन में,बना हुआ आधार सदा।

जल से सदैव जीवन चलता,जल से करना प्यार सदा।।

 

प्रकृति वारि से हरी-भरी है,खिले हुए रहते उपवन।

कृषक इसी से अन्न उगाता, देता जन-जन को भोजन।।

 

धरती का श्रृंगार इसी से, इससे ही बनते बादल।

जल को जीवन भी कहते हैं,नदिया बहती नित अविरल।।

 

जल का संचय करें सभी जन,जल को मत व्यर्थ बहाएँ।

जल का दोहन बंद करें सब,भू का अस्तित्व बचाएँ।।

 

बाग-बगीचे नदियाँ कानन,प्रकृति संपदा है जल से।

मानव का अस्तित्व यहांँ पर,आज नहीं यह है कल से।।

 

जल का संरक्षण करना तो , हम सबकी जिम्मेदारी|

धरती का अस्तित्व इसी से,इससे ही दुनिया सारी।।

 

बिंदु-बिंदु से सिंधु भरे है,पानी को नहीं गवाएंँ|

वर्षा का जल बहने मत दें, पोखर तड़ाग में लाएंँ|।

 

जल के बिना न रह सकता है,मानव इस वसुंधरा पर।

जल का संकट है भविष्य में,वैश्विक होगा महासमर।।

 

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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