
घुँघरू, पायल थिरकते कदम,
कमर करधनी झूमें छम छम,
सावन की ऋतु आई सुहानी,
नृत्य करें मयूर मन मानी।
झूले पड़ गये डाली डाली,
मन मोहन संग राधा रानी,
पेंग लगाते, मन्द पवन है,
वर्षा ऋतु में सूरज नम है।
धरती से लेकर अम्बर तक,
पर्यावरण अब पूर्ण तरल है,
पावस ऋतु अति पावन है,
कितना सुंदर यह सावन है।
इन्द्र धनुष सुहाने नभ में हैं,
सतरंगी छटा मनोहर दिखती,
दादुर, मोर चहकते चहूँदिसि
पिहू पिहू से पपीहा चहकती।
आदित्य मनमयूर थिरकन है,
पायल की धुन रुनझुन है,
वन उपवन सब कुसुमित है,
कितना मनमोहक मौसम है।
डा० कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ




