साहित्य

लघुकथा:मनसउनी

डाॅ०-शिवकुमार सिंह

बरखा थमि चुकी रहय। गाँव के कच्चे रस्तन पै मिट्टी कै सोंधी खुशबू पसरी रहय। अमवा कै बगिया मा चिरई चहचहाती रहंय। रामदीन के आँगन मैइहाँ शहर से पढ़ि के आय रही बिटिया गुड़िया तुलसी के बिरवा मा पानी डारत रहय।

तबहीं रामदीन के बूढ़ि दादी मुस्कियाइ के कहिन-“बिटिया, तू तौ हमार असली मनसउनी अहौ।”

गुड़िया हँसि पड़ी—”दादी, ई मनसउनी का होत है?”

दादी बोलीं—”जे मन क भा जाय, जेकर बोली सुनिके थकान उतरि जाय, जे अपनापन देय, उहै मनसउनी होय।”

एही बीच पड़ोसिन चाची फुलमती आय गयीं। उ कहय लागीं-“रामदीन भइया,ई का शहर मा नौकरी मिलि जाई तौ अब ई गाँव काहे आई?”

गुड़िया धीरे से बोलिस-“चाची, जड़ छोड़ि के डार कब तक हरियर रही? गाँव मोर पहचान अहै।”

दुसरे दिन गुड़िया गाँव के लरिकन का जुटाइ के स्कूल क खाली कमरा साफ कराइस। पुरानी किताबन क छोटी लाइब्रेरी बनवाईस। बूढ़न का दवाई पढ़िके सुनावै लागि, नन्हकएन का कहानी सुनावै लागि, अउर बिटियन का पढ़ाई खातिर रोज बुलावै लागि।

धीरे-धीरे गाँव बदलै लाग। जवन लरिका खेलत-फिरत रहंय, उ किताब उठावै लागि। जवन बूढ़ लोग अकेलापन महसूस करत रहंय, उ गुड़िया क बाट जोहय लागि।

एक साँझ परधान जी कहिन-“बिटिया, तोहरे आवे से गाँव मा नई जान आ गई।”

रामदीन क आँखिन मा खुशी क आँसू छलकि आवा। दादी आसमान कैती ताकि के कहिंन-“भगवान, हर गाँव का अइसिन एक मनसउनी जरूर द्या।”

गुड़िया मुस्कुराय दिहिस। उका लागै लाग कि मन जीतै खातिर धन-दौलत नाहीं, बस मीठी बोली, सेवा अउर अपनापन चाही।

सच्चै, मनसउनी ऊ नाहीं जे सिरिफ रूप से सुन्दर होय, ई त ऊ होय जे आपन व्यवहार से सबके मन मा बसि जाय।

कविराज डाॅ०-शिवकुमार सिंह ‘शिव’

दुसौंती रायबरेली-२२९३०६

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