
अधूरी हूँ मैं
टूट गई हूँ
बिखर कर
अब चूर हो गई हूँ
परेशान हूँ खुदसे
पर खामोश हूँ
सोच रही हूँ
सिर्फ कुसूर मेरा
ढूंढ रही हूँ
गलती मेरी
जो कभी थी ही नहीं
शायद परेशान नहीं
ना काम हूँ
अब खुदके लिए
अंजान हूँ
डर रही हूँ
खुदके होने पर
टूट रही हूँ
खुदके जीने पर
पर किया पता
की सवाल है मेरा
शायद मेरी ही गलती हैं
खुदमे ही खामोश हूँ
खुद ही परेशान हूँ
करीब नहीं हूँ
खुदके अब
अब कोई में खाश नहीं
बस साथ नहीं किसी के
पर मैं भाग रही हु सबसे ।।
– रिया राणावत
कालीदेवी, झाबुआ (मध्यप्रदेश)



