साहित्य

खु़द का भी एहतराम ज़रूरी है

डो. दक्षा जोशी

गै़रों की चौखट पर तो

झुके हो कई बार,

कभी अपनी रूह के

आँगन में भी क़दम धरिये,

दुनिया की बंदगी में

गुज़ार दी उम्र तमाम,

खुद को भी एक बार सज्दा कीजिये।

उन हाथों को चूमिए,

जो थक कर भी थमे नहीं,

उन आँखों को सराहिए,

जो रोकर भी थकी नहीं,

हज़ार कमियों के बाद भी

जो खड़ा है आपके भीतर,

उस ‘अस्तित्व’ का

थोड़ा तो लिहाज़ कीजिये,

ख़ुद को भी एक बार सज्दा कीजिये।

माना कि आप ख़ुदा नहीं,

पर ख़ाक भी तो नहीं,

किसी की नज़रों में नहीं,

तो खु़द की नज़र में संवरिये,

दूसरों के जख़्मों पर तो मरहम खू़ब लगाए आपने,

आज अपने ही टूटे हुए दिल से थोड़ी वफ़ा कीजिये,

खु़द को भी एक बार सज्दा कीजिये।

भीड़ का हिस्सा बनकर

खो गए हैं कहीं आप,

फुर्सत निकाल कर खु़द से भी मुलाकात कीजिये,

जितनी दुआएं माँगी हैं

दूसरों की सलामती के लिए,

एक सजदा अपनी मुकम्मल

हस्ती के नाम कीजिये,

खुद को भी एक बार सज्दा कीजिये।

 

डो. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’

अहमदाबाद, गुजरात।

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