नभ में मेघा काले छाये, झूम उठा किसान।
चिंता उसकी अब कम होगी, मिला मेह निदान।।
धान और मक्के को बोना, चला हुआ विहान।
मानसून ने दस्तक दी जब, खुशियों के निसान।।
धान रोपण खेत में जाए, वो बने चट्टान।
मिट्टी में सोना उग जाता, विधि का है विधान।।
भूख सभी की वो मिटाए, करता अन्न दान।
धरती माँ का वो है लाडला, श्रम बूँद पहचान।।
मूंग, उड़द और अरहर जैसी, दलहन संसार।
मूंगफली और तिलन का भी, सज गया बाजार।
मिट्टी-पानी और नमी से, अँखुआ का वितान।
झूम झूम के पवन चले जो, मुख खिले मुस्कान।।
स्वरचित मौलिकअप्रकाशित
डॉ अनुराधा प्रियदर्शिनी
मथुरा उत्तर प्रदेश




