साहित्य

माता- पिता पहले गुरु जो अंधकार

संगीता वर्मा

माता- पिता पहले गुरु जो अंधकार को दूर भगाकर, जीवन में प्रकाश लाते हैं,

सच्चा मार्ग दिखाकर हमको, गुरु इंसान बनाते हैं।

ज्ञान की गंगा बहाकर वे, मन का मैल मिटाते हैं,

गलत राह पर चलने से वो, हमको रोज बचाते हैं।

 

अक्षर-अक्षर का ज्ञान देकर, योग्य हमें बनाते हैं,

ऊँच-नीच का भेद मिटाकर, पाठ प्रेम का पढ़ाते हैं।

ईश्वर से भी बढ़कर हमको, गुरु का मान बताते हैं,

संकट की हर आंधी में वे, ढाल बनकर आते हैं।

 

आज पूर्णिमा के दिन हम, शीश झुकाकर आते हैं,

चरणों में अपने गुरु के, शत-शत नमन चढ़ाते हैं।

जीवन की इस बगिया को वे, सुंदर फूल खिलाते हैं,

रहें सदा आशीर्वाद उनका, हम यह प्रार्थना करते हैं।

 

अमूल्य शिक्षा देकर हमको, महान विप्र बनाते हैं,

ऐसे गुरु के चरणों में हम, जीवन अपना वारते हैं।

गुरु बिना इस दुनिया में, किसको ज्ञान है मिलता?

उनके ही आशीषों से यह, भाग्य हमारा खिलता!

 

स्वरचित रचना

संगीता वर्मा

कानपुर उत्तर प्रदेश

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