
प्रभु जगन्नाथ हैं सबके साथ
वह देते खुशियों का प्रसाद।
उनको भी पा लेता अनाथ
श्रद्धालु पर है उनका हाथ ।।
आषाढ़ मास है परम पुनीता
देखत बनती है रथ यात्रा ।
संगी हैं बलभद्र – सुभद्रा
पहुँचे मौसी घर गुंडिचा।।
जो गर्भ गृह में रहते भगवन
देने निकले भक्त को दर्शन ।
सबकी सेवा श्रद्धा समर्पण
देख प्रेम प्रभु महा मगन ।।
रिश्तों को है कायम रखना
तो जगन्नाथ का सुन कहना।
जीते जी सबको है सहना
यही है जीवन का गहना ।।
स्वरचित – डाॅ.रेखा सक्सेना
मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश ।




