
धूम -धुंआरे ,कजरारे बादल,
अब जल्दी से आ जाओ रे।
ताप तप्त हो बैठी वसुधा,
उसकी प्यास बुझाओ रे ।
बूंदों की खन-खन,छन-छन से,
मन का साज बजाओ रे।
धूम धुंआरे ,बदरा कजरारे,
जल्दी से आ जाओ रे।
सूखे सारे ताल,तलैया
तृण को तरसे कान्हा-गैया।
नीरस अधर,उदास हैं आँखें ,
पंछी भी न पसारे पाँखें,
इनका सावन दे जाओ रे।
धूम धुंआरे बदरा कजरारे ,
जल्दी से आ जाओ रे।
देखो करती चपला कर्षण,
तेरे उर में भी है गर्जन।
हुई हवा संग आँख- मिचौली ,
अब होने दे बूंदों का नर्तन।
बरस ,धरा को दे दे जीवन,
नभ निरभ्र कर जाओ रे।
धूम धुंआरे कजरारे बदरा,
अब जल्दी से आ जाओ रे।
आओगे तुम, खिलेगा अंतर
बीज हंसेगा बनकर अंकुर।
पादप झूमें हिल-हिल,खिल-खिल।
हरियाली का हरित समंदर,
धरती पर लहराओ रे ।
धूम धुंआरे बदरा कजरारे,
जल्दी से आ जाओ रे।
इंद्रधनुष भी उगेगा मनहर,
पांखुरी-ओट से झाँके कलिका,
रूप, रस और गंध से भरकर।
तुहिन कणों की रजत निर्झरी,
झरे,करे कलरव झर -झर।
अब मत देर लगाओ रे ।
धूम-धुंआरे, बदरा कजरारे
जल्दी से आ जाओ रे।
कालिदास के यक्ष को मेघा ,
फिर याद तुम्हारी आई है।
पिय ने फिर से नेह भरी
पाती प्रिया को पठाई है।
दूर देस बैठी विरहिन को,
प्रेमसंदेशा दे आओ रे।
धूम -धुंआरे बदरा कजरारे,
जल्दी से आ जाओ रे।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली



