
नीरद बन जीवन को सींचो, धरा हरी मुस्काए।
सूखी डाली प्यासे उपवन, नव जीवन फिर पाए।
गर्जन कर चेतना जगाओ, तम का मान मिटाओ।
रिमझिम बनकर प्रेम सुधा से,जग का ताप बुझाओ।
खेत बाग वन हर्षित होते, अन्न भँडार सजाते।
पशु-पक्षी सब नाच उठें जब, मेघ मल्हार सुनाते।
पर उपकारी बनकर नीरद, सबकी प्यास बुझाना।
अपना सर्वस्व लुटाकर भी, जग में यश है पाना।।
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा’ सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार



