
ईंटों से तो घर बनते हैं,
घर का मन रिश्तों से है।
सूखी रोटी भी अमृत लगती,
यदि अपनापन किस्सों में है।
कहाँ गए वो ताऊ-चाचा,
कहाँ बुआ का प्यार गया?
मामा-मौसी, फूफा-फूफी,
सबका क्यों संसार गया?
जीजा-साली की ठिठोली,
देवर-भाभी का सम्मान।
दादी की वह मीठी लोरी,
नाना-नानी का वरदान।
रिश्ते केवल नाम नहीं हैं,
जीवन की पहचान हैं।
इनसे ही त्योहार सुहाने,
इनसे घर भगवान हैं।
आओ फिर से प्रेम जगाएँ,
कटुता को अवकाश दें।
बच्चों को हम धन से पहले,
रिश्तों का विश्वास दें।
‘दिव्य’ की बस यही प्रार्थना
वंश नहीं, संस्कार बढ़ें;
स्वार्थ नहीं, परिवार बढ़ें।
टूटें नहीं आत्मीय रिश्ते,
घर-घर प्रेम के द्वार बढ़ें।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




