
जितनी बृहद विशाल धरा है, उससे बड़ा विहंगम काश,
उड़ने को पर दिए प्रभू ने,उड़ कर छू लें नव आकाश,
सबकी अपनी सीमाएं होतीं, करके प्रयास ही उन्नत होते,
किसी एक की ही नहि धरा अकेली, उड़ो जहां तलक आकाश।।
जगते हुए गंवाया जीवन का पीकर बस मौज उड़ाई,
विश्रांति मिली न सोच को तेरे
न ही करी उचित कमाई,
स्वप्न सजीले कभी न आते, ऊबड़-खाबड़ मन स्थिति में
शून्य होए मस्तिष्क तभी तो संकल्प की स्थिति तब पाई।।
ऊंचे हों संकल्प तुम्हारे,चलने को उन पर दृढ़ मन हो,
निढाल सा रह कर समय न काटो,स्वस्थ तुम्हारा तन हो,
विश्वास अटल अरु काग दृष्टि से लक्ष्य सभी पूरे होते,
छूने को आकाश नवल एक, जीवन बिल्कुल फन हो।।
मानव योनि मिली भाग्य से,भर पूर करें उपयोग सदा,
पशुओं जैसा न रहें धरा पर,खा पीकर ही रहें मस्त सदा,
मानव हैं मानव दिखना चहिए, गढ़ें नई पहचान हमारी
नव आकाश प्राप्ति की जिज्ञासा उड़ने को मन में रहे सदा।।
अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश




