
सर्दी आई, सर्दी आई,
हर कोई चाहे गरमाई।
खाने को गरम गरम,
पीने को भी हो गरम,
खस्ता मूँगफली औ पट्टी,
जिसने कोई थाह न पाई।
सर्दी आई ————-
स्वेटर, शॉल,टोपी औ मफ़लर,
कम्बल पर कम्बल और रजाई।
कितना भी ओढ़ें,हांँथ-पाँव ठंडे के ठंडे
सिगड़ी में है आग जलाई,
तब जाकर आई गरमाई।
सर्दी आई ————
सांँझे-रात नीँद जो आए,
सुबह कुहासे में खुल न पाए,
सूरज के दर्शन को तरसें,
धूप तो मानो शीत मनाए,
पकवानों ने होड़ मचाई।
सर्दी आई ———
माघ बीत रहा है, पर बादल न आए,
चिंतित कृषक,होगी कैसे पुष्ट फसल?
लोहिड़ी,संक्रांति,ओनम, औ पोंगल संग खुशियांँ आई,
गुड़, तिल,मूँगफली,औ लड्डुओं ने है भीड़ लगाई।
सर्दी आई, सर्दी आई,
हर कोई चाहे गरमाई।।
सुषमा श्रीवास्तव, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




