साहित्य

फूलों से सीखें

ममता झा मेधा

काँटो के बीच रहकर भी,
फूल सदा मुस्कुराती ,
खुशी और खुशबू सदा दुसरों पर लुटाती।

विपरीत परिस्थितियों में भी,
जीना उससे सीखें,
गम के आँसू पीकर भी,
मस्ती में झूमें गाएं।

धूप लगे ठंडक पड़े,या हो खुशियों की बरसात,
खिलना उसका काम है,
देना है सबको सौगात।

परागकण देकर सदाबहार गीत गुनगुनाती,
कभी किसी ने रौंदा भी दिया, फिर भी खुशबू फैलाती।

देवों के शीश चढ़कर भी कभी नही इतराती ,
किसी ने तोड़ा किसी ने फेंका फिर भी मुस्कुराती।

किसी ने सहलाया भी,सौख से गमले में रखा,
खुशियों का रंग बिखेरती, दिन रात मैं पका।

हर परिस्थितियों का किया सामना, पर अपना गुण ना छोड़े,
मंडराते रहते हरदम
मधुमक्खी, तितली और भौंरे।

पीकर सारा रस मेरा,
झूमकर उड़ती है,
इतना दर्द सहकर भी,किसी से नही झगड़ती है।

ईर्ष्या लालच में न आना मानव, फूलों से सीखें उपकार,
खुशियाँ बिखेरी धरती पर,
खुशियों की हरदम बरसात।
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ममता झा मेधा
डालटेनगंज

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