साहित्य

देखते हैं कौन जीतता है

डॉ रामशंकर चंचल

मै सदा ही
बोलता हूँ
तुम हूँ हूँ
करती
अच्छा लगता हैं
यही अच्छा लगने लगा
मन को बहुत ही
सोचा चलों
आज यही खेल
खेले
में बोलता हूँ
तुम, हूँ, हूँ
करना
तब तक
जब तक
मै बोलता हूँ
जो हरा
फिर वह बोलेगा
दूसरा, हूँ हूँ
करेगा
यह शर्त
इस लिए
रख रहा हूँ कि
मै बोल कर भी
नहीं थकता हूँ
तुम हो न सामने
तुम, फिर भी
हूँ, हूँ कर थक सकती हो
चलों न
इस मै क्या है
हूँ तो करना है
कुछ समय ही
निकाल लेने मै
क्या बुरा है
लोग तो अपनों के लिए
बहुत कुछ कर जाते है
मै तो तुम्हें
हूँ, हूँ करने का
ही कह रहा हूँ
चलों उठो
कब तक सोती रहती हो
मन बनाओ
आओ
बहुत मन है
हूँ सुना जाय
तुम्हारे
तुम से

डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश

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