साहित्य

ग़ज़ल: रोटी

दिनेश पाल सिंह दिलकश

महलों में सजी थाली को क्या समझ आए रोटी,
झोपड़ी ने सीखा है जीना बस खाकर रोटी।

दिन-रात पसीना बहा कर जब घर लौटा मजदूर,
माथे की हर बूंद ने ही पहले छुई रोटी।

सच बोलने की कीमत अक्सर भूख से चुकानी पड़ी,
झूठों की बस्ती में सबसे ज़्यादा रूठी रोटी।

काग़ज़ पर सपने लिखे थे, पेट ने सब फाड़ दिए,
हालातों से हार न मानी, फिर भी रही टूटी रोटी।

दुनिया ने जिनको लूटा, वक्त ने जिनको तोड़ा,
उनकी आँखों में अब भी ज़िंदा है सच्ची रोटी।

दिनेश पाल सिंह दिलकश
जनपद संभल उत्तर प्रदेश

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