साहित्य

विनम्र श्रद्धांजलि

गोविन्द सूचिक

पिता जीवन का “दुर्लभ”संयोग
कभी न हो उनसे वियोग!
पिता होते तो बन जाती हर बात,
मिल जाती “जीवन की रसधार!
पिता जीवन की सुखद छाया,
पिता एक ” वटवृक्ष”
जो अपनी शाखाओं से तुम्हें संभाले
दुनिया की हर तपस से तुम्हें बचाते!
पिता एक “अहसास”
जो हरदम रहते तुम्हारे साथ!
पिता “बेशकीमती”अनुपम उपहार,
पिता ही अभिमान और स्वाभीमान!
पिता ही बच्चों का जीवन संवारते,
पिता ही बच्चों के अरमान,
पिता ही धरती और आसमान!
पिता ही “बहुमूल्य “दौलत,
इससे न बड़ी दुनिया में कोई शौहरत
पिता ही मित्र पिता ही गुरु,
नि: स्वार्थ लुटाते सभी से प्यार!
मानो या ना मानो‌ यारो,
पिता पर लिखना क्या?इतना आसान
उसके आगे सारा जग नादान!
(गोविन्द सूचिक हरदा मध्यप्रदेश)

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