साहित्य

गीतिका

पूर्णिमा सुमन

राहें जो, मिल गई हैं, आगे बढ़ें सफर में।
आया न, जो अभी तक, वो ढूँढ लें भँवर में।

सच्चाई, का दिया जो, मन में जला रहे हम,
खोया जो, था उजाला, लाएँ न फिर सहर में।

भाषा जो, हो मधुर सी, जिससे मिले सुहानी,
देता जो, सुकून है, गुंजन उसी डगर में।

लिखते, हम कविताएँ, भावों को देके सुर,
रचना, सजेगी अपनी, शब्दों के इस शहर में।

कलियाँ, खिल उठी हैं, खुशबू बिखर रही है,
जुगनू, चमक रहे हैं, रातों की इस पहर में।

वादे, जो याद आए, उनको निभा रहे हम,
टूटे, जो तार मन के, जोड़ें उसी उमर में।

आँखें, जो बोलती हैं, खामोशियाँ गवाह हैं,
दिल में, जो बात दबी, खोलें इसी बसर में।

धड़कन, है साथ चलती, कदमों की है यही लय,
सपनों, का कारवाँ है, चलते रहें सफर में।

पूर्णिमा सुमन
झारखंड धनबाद

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