
घर की हर ज़रूरत का इंतज़ाम वही कर गया,
फिर भी सबसे बड़ा नाकाम उसे ठहरा दिया गया।
अपनी हँसी गिरवी रख, सबको मुस्कान दे गया,
ख़ुशियों का सौदागर ही बदनाम ठहरा दिया गया।
जिसकी कमाई से हर तीज–त्योहार सजा रहा,
मतलब निकलते ही वो गुनहगार ठहरा दिया गया।
माँ–बाप की छाया, बहन की ढाल बना रहा,
फिर भी रिश्तों में ही पराया ठहरा दिया गया।
उसने पूछा भी नहीं “मेरे हिस्से क्या बचा?”,
फिर भी हर बँटवारे में घाटा ठहरा दिया गया।
जो घर की इज़्ज़त हर मोड़ पर ढोता ही रहा,
भीड़ में वही सबसे बड़ा तमाशा ठहरा दिया गया।
सच बोल दिया तो बदतमीज़ी का नाम मिला,
चुप रहा तो कायर-बुज़दिल ठहरा दिया गया।
वह बेवकूफ नहीं था, बस ज़्यादा ज़िम्मेदार था,
इसी समझदारी में नासमझ ठहरा दिया गया।
दिलकश कहता है,घर की यही पुरानी रीत है,
जो सब कुछ लुटा गया, दोषी ठहरा दिया गया।
*दिनेश पाल सिंह दिलकश*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*



